सैनिक को तो जंग पे जाना
कभी कभी ही पड़ता है.
पर बच्चों को स्कूल भेजना
रोज़ ही करना पड़ता है.
भेजे में है घुसता छूरा
सुबह जो अलार्म जगाता है.
अगले दो घंटे में पूरा
भेजा फ्राई हो जाता है .
"उठो उठो" सुनकर न उठते
टांग खींचनी पड़ती है .
खुद के हाथ पैर टूटते
जब ब्रश करवानी पड़ती है.
कित्ती अच्छी नींद है आती
सुबह जो बच्चे सोते हैं .
जिस दिन स्कूल की होती छुट्टी
खुद जल्दी उठ जाते हैं.
अरे अभी तक ब्रश ही करते!.
पोटी में कब तक बैठोगे !
कितनी बार ये हम चिल्लाते
लेट हो जाओगे , लेट हो जाओगे.
सुबह सुबह चलता ये द्वन्द
युद्ध क्षेत्र से नहीं है कम
नाश्ता हुआ टिफिन में बंद.
जितने बच्चे उतनी जंग.
बच्चों को स्कूल भेजकर
लगता है कर दिए करिश्मे
इतनी जल्दी कैसे सजधजकर
बैठ गए बच्चे ऑटो में.




