Thursday, May 10, 2012

सैनिक को तो जंग पे जाना 
कभी कभी ही पड़ता है. 
पर बच्चों को स्कूल भेजना 
रोज़ ही करना पड़ता है. 
भेजे में  है घुसता छूरा
सुबह जो अलार्म जगाता है.
अगले दो घंटे में पूरा 
भेजा फ्राई हो जाता है .
"उठो उठो" सुनकर न उठते
टांग खींचनी पड़ती है .
खुद के हाथ पैर टूटते 
जब ब्रश करवानी पड़ती है.
कित्ती अच्छी नींद है आती
सुबह जो बच्चे सोते हैं .
जिस दिन स्कूल की होती छुट्टी
खुद जल्दी उठ जाते हैं.
अरे अभी तक ब्रश ही करते!.
पोटी में कब तक बैठोगे !
कितनी बार ये हम चिल्लाते 
लेट हो जाओगे , लेट हो जाओगे.
सुबह सुबह चलता ये द्वन्द
युद्ध क्षेत्र से नहीं है कम
नाश्ता हुआ टिफिन में बंद.
जितने बच्चे उतनी जंग.
बच्चों को स्कूल भेजकर
लगता है कर दिए करिश्मे
इतनी जल्दी कैसे सजधजकर
बैठ गए बच्चे ऑटो में. 

Wednesday, April 11, 2012

सागर किनारे ये क्या हो गया..


आते रहे रोज नए मुसाफिर कई सारे
लेकर कश्तियाँ, तहजीबें नयी नयी .
देखते ही देखते इस समंदर किनारे
बसे डेरे और बस्तियां भी बस गयीं.
सजने लगे बाज़ार साजो-सामान के
दुकानों पे भी चहल पहल होने लगी
और भरने लगे मेले खेल- करतबों के
जगह जगह की चीज़े यंहा मिलने लगीं
बस्तियां बड़ी हुई, शहर में तब्दील
शहरों में आ गए रीत-रिवाज़ कई
कुछ लोग रिवाजों के पहरेदार बने
हसरतों को जंजीरें पड़ती गयीं
अनायास ही सागर तट की दुनिया
जहाँ लहरों सी ख्वाइशें बहती थीं
जहां इंसान कायदों से अहम् था
रेत पे लिखे नाम की तरह खो गयीं.
आज समन्दर की हवाएं पूछती हैं
अरमान क्यूँ जले ये धुआं क्यूँ बना
धुंए में छिपा चाँद भी पूछता है
कारवां क्यूँ आया शहर क्यूँ बना ?

Tuesday, March 6, 2012

उत्तर प्रदेश विस चुनाव नतीजों से निकले दस मायने


  1. एंटी- इनकम्बेंसी काम करता है.
  2. करिश्मा/ग्लेमर काम नही करता.
  3. नौकरशाहों को प्रताड़ित करके चुनाव नहीं जीता जा सकता.
  4. सम्प्रदायवाद जातिवाद पर हावी है.
  5. भ्रष्टाचार अभी तक कोई मुद्दा नहीं है.
  6. धनबल बाहुबल पर भारी है.
  7. अन्ना आन्दोलन का असर पड़ा है लेकिन कम .
  8. एक्जिट पोल सही निकलते हैं.
  9. जनता का भला होगा इसके संभावनाएं कम हैं.
  10. चुनावों की कोई ख़ास ज़रुरत नहीं है.

Friday, February 10, 2012

कभी यूँ होता है क्यूँ ...

कभी लगती है कल की सी कोई बात
बहुत पुरानी हो चुकी कोई बात .
कभी याद नहीं आती वो बात
कल ही हुई जो हमारे साथ .
कभी किसी की छोटी सी खता
कर देती है सुकून लापता.
कभी खुद के बड़े गुनाह
मन गलीचे के नीचे लेता है छुपा.
कभी याद आता है किसी का दुलार
जिसका एहसान हम पर है उधार
कभी किसी को धोखा देकर भी
हम हड़का लेते हैं उसे कभी.
कभी सुनते हैं सिर्फ उसकी
जो हमारा कोई भी नही
कभी उनकी अनसुनी करते हैं
जो हमारे लिए ही जीते हैं.
बेवकूफी और खुदगर्जी
की सिर्फ चलती है मर्जी
भला बनाने की बातें
बातें रह जाती हैं, सिर्फ बातें.

Thursday, January 5, 2012

कुछ सालों पहले पूछे कुछ सवाल ....

अधिक होना गंतव्य और सीमाओं का
कम होना संसाधन और सुविधाओं का
क्या वंचित रह जाना ही नियति है ?
एक मात्र जीवन की अप्राप्त्य अनेकों खुशियाँ
अनेक कडवी स्मृतियों में दफ़न व्यक्तित्व
क्या चिर अवसाद ही जीवन गति है?
रिश्ते हुए कुछ पलों में एकत्र होता अवांछित अनुभव
दूर की मंजिल पर टिकी निगाहों से छिपता हुआ रास्ता
क्या कुछ जिंदगियां सिर्फ काटों पर चलने के लिए बनी हैं?

आज जीना है...

आज कोई
यक्ष प्रश्न न किया जाये.
भुला दिया जाये
आज
विगत के आवरण को
अग्रिम अवसाद को
और
विलीन किया जाये
चेष्टाओं की प्रतिमा को
संभावनाओं के समुद्र में
क्योंकि
जब हर लकीर
छोटी है
एक बड़ी लकीर से
तो
लकीरों की शैय्या पर
क्यों सोया जाये.
क्यों न बिछाली जाये
सरलता की सफ़ेद चादर
और गुनगुनाया जाये
क्योंकि आज
विवेचनाएँ व्यर्थ हैं.
और शेष है
अनंत ज्ञान .

Saturday, November 26, 2011

बॉस से झगडा किया, सोचा नौकरी छोड़ दें , फिर ये कविता लिखी और सो गया..

हमसफ़र खोजा किये जब रास्ते तन्हा हुए
तेरे निशाँ ढूँढा किये जब रुसवा-ए-महफ़िल हुए
ख़ाक ही छाना किये जब ज़मीं से जुदा हुए
वक्त ही जाया किये जब तेरे बिन जिंदा रहे
ठोकरें खाते रहे जितना भी खुद बखुद चले
वक्त को नामंज़ूर था जिस जिद पे हम थे अड़े