Monday, December 31, 2007

नए साल का रिजोल्यूशन


दिल किसी का न दुखाऊँ

मैं आने वाले साल में

रूठों को मनाऊँ

मैं आने वाले साल में

बच्चों को ज्यादा खिलाऊँ

मैं आने वाले साल में
जल्द माँ को मिल आऊँ

मैं आने वाले साल में
कुछ पौधे लगाऊँ

मैं आने वाले साल में

कबूतरों का चुग्गा न भूल जाऊं

मैं आने वाले साल में

धूल पुरानी किताबों से हटाऊं

मैं आने वाले साल में
संगीत के करीब आ पाऊँ

मैं आने वाले साल में

शिकायतें दूर कर पाऊँ

मैं आने वाले साल में
किसी को तो खुश कर पाऊं
मैं आने वाले साल में





Thursday, December 27, 2007

ट्रेन बिंदास, प्लेन बकवास


धमाल मस्ती ट्रेन की

क्या बिसात प्लेन की
मात्र १५०० रुपये में

बाम्बे-दिल्ली रिटर्न है

एयरपोर्ट में झिकझिक

ट्रेन में चलो बेफिक्र

ट्रेन में है असली इंडिया

प्लेन में बस खर्चा किया

Wednesday, December 26, 2007

बटोर लो खुशियाँ



क्यों नाराज़ होते हो

ज़रा ये सोचो तो

क्या तुम गंवाते हो

जब नाखुश होते हो

क्यों वक्त गंवाएं सोचने में

कुछ राही समय के बहाव में
पहुंच जाते हैं मंजिलों के सामने
ठहर गए जो सोचने समझने में
उम्र गुजर जायेगी इसी मुकाम पे

Monday, December 24, 2007

पूछो , पूछने दो

एक अनपेक्षित प्रश्न
ये हो सकता है
एक नए युग का रचयिता
क्योंकि भविष्य का रुख
अपेक्षित संवादों से
बदला नहीं जा सकता

Friday, December 14, 2007

आज सुबह उम्मीदें आयीं


मेरी खिड़की से आज सुबह

कुछ उम्मीदें आयीं


बाहर एक पेड़ पर

कोई चिडिया चहचहायी

शायद ये दिन अच्छा है

जो सुबह इतनी मुस्कुराई

किशोर का ' हजार राहें ' सुनते हुए लिखा...

वो आये खुशबुएँ लेकर
चले गए खलिश देकर
अब हमें नहीं ख़बर
कहाँ है वो नज़र
प्यार जिनमें इस कदर
हमें लगा जायेंगे मर
ये नामुमकिन है मगर
अब ना जाना छोड़कर

Thursday, December 13, 2007

सेंसेक्स की महिमा


छः गुना बढ़ गया सिर्फ चार साल में
एक ही मुद्दा है सबकी बोलचाल में
ख़ुशी से उछलते हैं लोग उसकी उछाल में
उसका जलवा है हर घर दफ्तर चाल में
कितनों का वक़्त गुज़रता है इसी सवाल में
कितना गिरा कितना उठा सब इस जंजाल में
न होता ये तो होते लोग किस हाल में
क्या दिन इतना बड़ा होता है-रहते इसी ख़याल में

Monday, December 10, 2007

अपने हाथों की लकीरों में..


मेरे हाथ में तेरा हाथ था

वो कुछ घड़ी का साथ था

सच था कोई या ख्वाब था।


सब कुछ चमक रहा साफ था

अंधेरों का वक़्त ही खराब था

तेरा नूर बेहिसाब था।


फिर भी .....

कोई दूर नहीं था
तू नजदीक था फिर भी ...
कोई ग़ैर नहीं था
तू मेरा अक्स था फिर भी ...
अजनबी तो नहीं था
मेरा हमसफ़र था फिर भी ...
में तेरी लकीरों में नही था
हाथ में थामा था नसीब फिर भी ...
मुलाक़ात इक हकीकत थी
सपना ही लगता है फिर भी ...