Monday, November 3, 2008

चाँद पे पंहुचे हम भी - एक ख़याल

चाँद पे पडी नज़र

वो जा रहा था बेखबर


पूछा मैंने रोककर


ऐ बादलों के हमसफ़र


खफा है क्यों तू इस कदर


कि देखता नहीं इधर


बिना जवाब के मगर


चल दिया अपनी डगर


अपना मन मसोस कर


हम भी आ गए हैं घर


उदास हैं ये सोचकर

जो रहते हैं ज़मीन पर

मिलना नहीं उन्हें अगर

चांदनी का कतरा भर

तो क्यूं मिली है ये नज़र

क्यूं बना है ये मंज़र

करे जो दिल को तर-बतर

1 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, बहुत बढिया.