Sunday, November 16, 2008
कान्हेरी गुफाएं और बोरीवली नेशनल पार्क
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Tuesday, November 4, 2008
टू-डू लिस्ट :- क्या सच में हमें पता है क्या है करना ?

किसकी क्या हो प्राथमिकता ?
अपनी टू - डू लिस्ट देखता
और कुछ निशान लगाता
तभी मेरा माथा ठिनकता
और में कुर्सी से उठता
कलम मेज पर पटकता
और बालकनी जा पंहुचता
और सोचता-
क्या में कभी सही था ?
समझ पाने में प्राथमिकता
जितना जीवन है बीता
क्या मुझे था पता ?
गया में जो कुछ करता
क्या वो उसी क्रम में था?
जिसमे वो लाजमी था
अंतर्मन नही झुठलाता
बोला- बिगडी है प्राथमिकता
पर अगर सब मेरे बस में था
तो क्यों ये है कहा जाता
सब पर 'उसका' बस चलता
क्या ऊपर वाला भी बनाता ?
टू डू लिस्ट जैसा खाता
यही सब विचारता
में बालकनी से देखता
भागता ट्रेफिक और रास्ता
तभी फोन घनघनाता
और कोई मुझे बताता
एक काम या समस्या
एक और काम जुड़ जाता
मेरी टू डू लिस्ट में ।
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Monday, November 3, 2008
चाँद पे पंहुचे हम भी - एक ख़याल
चाँद पे पडी नज़रवो जा रहा था बेखबर
पूछा मैंने रोककर
ऐ बादलों के हमसफ़र
खफा है क्यों तू इस कदर
कि देखता नहीं इधर
बिना जवाब के मगर
चल दिया अपनी डगर
अपना मन मसोस कर
हम भी आ गए हैं घर
उदास हैं ये सोचकर
जो रहते हैं ज़मीन पर
मिलना नहीं उन्हें अगर
चांदनी का कतरा भर
तो क्यूं मिली है ये नज़र
क्यूं बना है ये मंज़र
करे जो दिल को तर-बतर
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Song for the full moon
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