
बह चली थी ये कश्ती जिस मांझी के सहारे
इक दिन पड़ा दिखायी वो किसी और ही किनारे
क्यों झूठ की पतवार से सफ़र तय किये सारे
क्यों लगते थे वो अपने जो कभी थे नहीं हमारे
ये सोच रही कश्ती, सांझ ढली, अब किसको पुकारे
कश्ती ये बनी तिनका -जो बहता है बेसहारे
तिनके की क्या बिसात जो बदले किसी की सोच के धारे
बस एक ही आरजू है वो मांझी कभी न हारे
रहे खुश वो हमेशा , जिए, और ज़िन्दगी सँवारे
रात ढल रही है, तिनका है, दरिया है, और चारों तरफ तारे.


3 comments:
अति सुन्दर.
darakht ki chhanv me mili yah hari bhari kavita bahut pyaari hai
badhaai !
बहुत सुंदर कविता!
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