Wednesday, July 8, 2009

बनयान ट्री के नीचे लिखी एक कविता


बह चली थी ये कश्ती जिस मांझी के सहारे
इक दिन पड़ा दिखायी वो किसी और ही किनारे
क्यों झूठ की पतवार से सफ़र तय किये सारे
क्यों लगते थे वो अपने जो कभी थे नहीं हमारे
ये सोच रही कश्ती, सांझ ढली, अब किसको पुकारे
कश्ती ये बनी तिनका -जो बहता है बेसहारे
तिनके की क्या बिसात जो बदले किसी की सोच के धारे
बस एक ही आरजू है वो मांझी कभी न हारे
रहे खुश वो हमेशा , जिए, और ज़िन्दगी सँवारे
रात ढल रही है, तिनका है, दरिया है, और चारों तरफ तारे.

3 comments:

Udan Tashtari said...

अति सुन्दर.

AlbelaKhatri.com said...

darakht ki chhanv me mili yah hari bhari kavita bahut pyaari hai
badhaai !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर कविता!