चाँद निकला इस जहां में,जाने कितनी बार
मैं भी जीया और मरा हूँ ,जाने कितनी बार
ऐसे अफ़साने बने हैं , जाने कितनी बार
जिनपे रोया चाँद होगा जाने कितनी बार
ये खुशी और ग़म मिला है , जाने कितनी बार
चांदनी चुभती लगी है, जाने कितनी बार
जिंदगी ऐसी कितनी कटी हैं मेरी कितनी बार
अर्थ जिसका समझ न आया , जाने कितनी बार
सही अगर कुछ नही था, सब गलत था क्या हर बार
जिसका होना ही गलत है , होगा जाने वो कितनी बार
Wednesday, October 7, 2009
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1 comments:
behad sunder experssion..............i like it
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