
मेरे एक मित्र मिलने आये, फोन माँगा और मेरी तरफ देखते ही देखते उन्होंने नंबर डायल कर दिया, गोया ज़नाब की उँगलियों में आँखे हों. बस तभी सूझीं ये पंक्तियाँ :-
कुछ फोन नंबर थे इस कदर इश्कियां
जिन्हें याद रखती थी हमारी उँगलियाँ
जिनको डायल करके मिलती थी दुनिया
जिसमें बांटे थे कितने ग़म कितनी खुशियाँ
पर जब मिला सच उन नंबरों के दरमियाँ
तो बह निकला फरेब का एसा इक दरिया
न रही जमी , न आसमां और ना आशियाँ
तौबा उन नंबरों से जो लाये ये आंधियां


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