
दिलकश आवाज़ वाले करण सिंह के रेडियो प्रोग्राम में ये गाना सुनने के बाद कुछ हुआ. एक पल भारी तो अगला पल हल्का. इस उथल पुथल भरे एहसास से निकलने के लिए लिखी ये कविता:-
"मेरा ज़िंदगी में कितने लोगों से परिचय है
सौ, दो सौ पांच सौ या कुछ हज़ार?
ज़्यादातर अच्छे लोग हैं , भला सोचते हैं, करते हैं.
पर कुछ ने मुझ पे, कुछ पे मैंने किया अत्याचार.
और कुछ तो मेरी समझ में, समझ से परे हैं.
बहुतेरे अवसरवादी हैं, पर ज्यादातर समझदार.
मेरी तरह मूर्ख तो कम ही हैं,
और वो बहुत कम जिनके हैं मुझसे विचार.
क्या मेरा व्यवहार समय के साथ नही है?
या मुझे आता ही नही निभाना कोई व्यवहार
या फिर मेरी सोच ही स्थिर नही है,
क्या में हूँ क्षणिक पागलपन का शिकार.
क्या स्वभाव से मेरा जीवन एकाकी है ?
क्यों आता है मुझे क्रोध कुछ लोगों पे बार बार?
क्यों मेरा मन हर चोट के बाद सोचता है?
लोग कैसे सुकून पाते हैं, करके छलावा लगातार.
या कुछ ऐसा है जो मुझे खुद में बदलना है
बनाना है खुद को-स्वीकार्य कमीना, ऐसा परतदार-
की हर परत में अपना सच अपना झूठ है,
और हर परत के बीच है अभेद दीवार.


1 comments:
क्या मेरा व्यवहार समय के साथ नही है?
या मुझे आता ही नही निभाना कोई व्यवहार
या फिर मेरी सोच ही स्थिर नही है,
क्या में हूँ क्षणिक पागलपन का शिकार
जब कभी हम निराश होते हैं तो शायद सब के मन मे यही प्रश्न उठते हैं? बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। शुभकामनायें
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