Thursday, December 17, 2009

वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन..



दिलकश आवाज़ वाले करण सिंह के रेडियो प्रोग्राम में ये गाना सुनने के बाद कुछ हुआ. एक पल भारी तो अगला पल हल्का. इस उथल पुथल भरे एहसास से निकलने के लिए लिखी ये कविता:-

"मेरा ज़िंदगी में कितने लोगों से परिचय है
सौ, दो सौ पांच सौ या कुछ हज़ार?
ज़्यादातर अच्छे लोग हैं , भला सोचते हैं, करते हैं.
पर कुछ ने मुझ पे, कुछ पे मैंने किया अत्याचार.

और कुछ तो मेरी समझ में, समझ से परे हैं.
बहुतेरे अवसरवादी हैं, पर ज्यादातर समझदार.
मेरी तरह मूर्ख तो कम ही हैं,
और वो बहुत कम जिनके हैं मुझसे विचार.

क्या मेरा व्यवहार समय के साथ नही है?
या मुझे आता ही नही निभाना कोई व्यवहार
या फिर मेरी सोच ही स्थिर नही है,
क्या में हूँ क्षणिक पागलपन का शिकार.

क्या स्वभाव से मेरा जीवन एकाकी है ?
क्यों आता है मुझे क्रोध कुछ लोगों पे बार बार?
क्यों मेरा मन हर चोट के बाद सोचता है?
लोग कैसे सुकून पाते हैं, करके छलावा लगातार.

या कुछ ऐसा है जो मुझे खुद में बदलना है
बनाना है खुद को-स्वीकार्य कमीना, ऐसा परतदार-
की हर परत में अपना सच अपना झूठ है,
और हर परत के बीच है अभेद दीवार.

Monday, December 7, 2009

फोन नंबर से जली उंगलियाँ



मेरे एक मित्र मिलने आये, फोन माँगा और मेरी तरफ देखते ही देखते उन्होंने नंबर डायल कर दिया, गोया ज़नाब की उँगलियों में आँखे हों. बस तभी सूझीं ये पंक्तियाँ :-

कुछ फोन नंबर थे इस कदर इश्कियां
जिन्हें याद रखती थी हमारी उँगलियाँ
जिनको डायल करके मिलती थी दुनिया
जिसमें बांटे थे कितने ग़म कितनी खुशियाँ
पर जब मिला सच उन नंबरों के दरमियाँ
तो बह निकला फरेब का एसा इक दरिया
न रही जमी , न आसमां और ना आशियाँ
तौबा उन नंबरों से जो लाये ये आंधियां