Monday, February 8, 2010

कुर्ग यात्रा की झलकियाँ:- आनंद विभोर करने वाला हिल स्टेशन

मैसूर के निकट कॉफी के प्लान्टेशन से भरपूर एक मनोरम स्थल जहां रूह को सुकून देने वाली शांति है-कुर्ग. जनरल करियप्पा के इस गाँव में है भारत का एकमात्र 'हाथी ट्रेनिंग स्कूल' और कुछ दिलचस्प हरियाली से परिपूर्ण बागान . जलप्रपात और इठलाती कावेरी यंहा के ठन्डे मौसम में संगीत के स्रोत हैं. यंहा के ब्राह्मणों के लिए पोर्क निषेध नही है. यंहा की 'कोडुगु' कौम के बहादुरी के किस्से मशहूर हैं. कहते हैं बन्दूक का लाइसेंस लेने के लिए सिर्फ 'कोडुगु' होना काफी है- और किसी कागज़ की आवश्यकता नही है. देखिये कुशल नगर से कुर्ग (मदिकेरी) का रास्ता- दोनों और कॉफी के प्लांट्स हैं. इलायची और शहद भी यंहां की विशेषता है.
एक समय था जब प्रसिद्द मैसूर दशहरे के लिए हाथी इस दुबारे केम्प से भेजे जाते थे. अब कुनबा जनजाति यंहा हाथियों को ट्रेन करती है.
हाथियों को करीब से जानने का मौका - दुबारे एलीफेंट ट्रेनिंग केम्प में.
दुबारे एक आईलेंड है. जब तक हमारी बोट आती है, तान्या आराम करते हुए.
क्यू जरा लम्बी थी तो पेड़ की जड़ पे ही बैठ जाएँ.
बोट के अलावा आप राफ्टिंग करके भी जा सकते हैं. कोई रेपिड नही, कोई खतरा नही.
कॉफी और काली मिर्च के बागान - इतना मसालेदार होलीडे और कहाँ मिलेगा ?
अलेक्जेंडर के वंशजों की इस धरती पर है ये सुन्दर अब्बी फाल
19 वी सदी में कोडागु राजाओं द्वारा बनाया गया ओम्कारेश्वर मंदिर. इसकी डोम इस्लामिक स्टाइल की हैं.
विंहगम दृश्य दिखने के लिए मशहूर 'राजा-सीट' से बादलों ने लुका छिप्पी खेली.
और न जाने कँहा से उठा ये बादलों का दल- हमें याद हो आयी वो ग़ज़ल- ये धुआं सा कँहा से उठता है ?
वादियाँ कितनी खूबसूरत होती हैं ये जानने के लिए आइये कुर्ग .
कुर्ग के आखिरी दो राजा यंहा दफ़न हैं. अब राजा सीट एक पार्क है.
कावेरी तट स्तिथ -निसर्ग्धाम . यंहा पे बना ये प्यारा सा मचान .
और हैं कई सरे ट्री हॉउस . एक वृद्ध पर्यटक के साथ फोटो खिंचवाती तान्या. मन में ख्याल आया- क्या उस उम्र में हम भी इतने फिट रह पायेंगे ?
मात्र दस रुपये में एलिफेंट राइड- मज़ा आ गया. निसर्ग्धाम तो पूरा एक हफ्ते रुकने वाला स्थान है.
कावेरी के तट पर कुछ समय. नदी की सुरम्यता को देख के लगा नंही कि इसके जल को लेकर राज्य इतना लड़े होंगे.
वन सम्पदा इस इलाके को भरपूर मिली है. जंगल दस्यु वीरप्पन तो आइकोन बन चुका है.
निसर्गधाम का लक्षमण झूला- मस्त जगह है.
तिब्बत के बाहर सबसे बड़ा तिब्बत- बेल्कुप्पे. अचरज हुआ कि दक्षिण भारत में इतना बड़ा बौध केंद्र है.
प्रखर यंहा के 'गोल्डन टेम्पल' के बाहर, और हम सब उसके बाद अन्दर फोटो निकलवाते हुए
और यात्रा समाप्त की मैसूर स्टेशन पर . दूर पीछे की चामुंडी पहाड़ियां शायद कह रहीं है- फिर आना.

4 comments:

दीपान्शु गोयल said...

वाकई खूबसूरत जगह है।

मुनीश ( munish ) said...

Beautiful , but i don't think i'd ever be able to come out of the spell of Himalayas. Seems good place provided itz some business trip.

Udan Tashtari said...

सुन्दर दर्शनीय जगह! बढ़िया चित्र.

RaniVishal said...

चित्र बहुत ही सु्न्दर है..!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/