Thursday, April 1, 2010

कल चौदवीं की रात थी..


सारा दिन मसरूफ रहा मैं
अब सोच रहा क्या होना है.
इस पूनम के चाँद से मुझको
दो बातें करके सोना है.
जिनसे छन जाती है ये चांदनी
कुछ उन पलकों को भिगोना है.
असमान जंहा चाँद सजा है
लगता दिल का कोई कोना है.
सुलझा कर मन के धागे को
यादों के मोती पिरोना है.
सदियाँ बीतीं इस चाँद ने सुना
जिसका भी रोना धोना है.
कल सुबह बैठ सूरज के घोड़े पर
फिर दौड़ में शामिल होना है.
माँ जैसा है रात का आँचल
इसमें लुक छिप खोना है.
इस पूनम के चाँद से हमको
दो बातें करके सोना है.

2 comments:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.