Tuesday, May 18, 2010

मोबाइल पर हिन्दी टाइपिंग

नया नोकिया E63 खरीदा। अच्छा फोन है, क्वर्टी की पेड और पुश इ-मेल बहुत उपयोगी है, पर निराशा हुई जब पता चला की इस ब्लॉग पर हिन्दी लिखना सम्भव नही है। फिर गूगल बाबा की मदद से INDISMS नामक एप्लीकेशन डाऊनलोड किया जिससे एस.एम्.एस तो हिन्दी में लिख जाते हैं।
पर यदि नोकिया जैसी बड़ी कम्पनी भी हिन्दी को सहरानाही देगी तो यह तकनिकी अदूरदर्शिता है।
एक शंका और है- क्या PC SUIT जैसे एप्लीकेशन के इस्तेमाल से मोबाइल में वायरस आने का खतरा है ?

5 comments:

संजय बेंगाणी said...

पीसी सूट का प्रयोग तो करना ही पड़ेगा. साथ ही महंगे फोन हिन्दी का समर्थन नहीं देते. नोकिया के सस्ते फोन देखें हिन्दी मिलेगी. इससे पता चलता है कि हिन्दी की औकात क्या है. मैं भी सैमसंग का एक फोन ले कर फँस गया. हिन्दी के डिब्बे दिखते है. अपने लिए अनौपयोगी है.

Sanjiv Kavi said...

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

संजय बेंगाणी said...

नोकिया को धन्यवाद दें कि हिन्दी पढ़ पा रहे है. यानी हिन्दी फोंट तो डाले हुए है. सेमसंग ने तो वह भी नहीं किया है.

अनुनाद सिंह said...

अच्छा किया आपने यह समस्या सबको बता दी।

आप पवन उर्जा के इंजीनियर हैं। हिन्दी विकि पर इससे सम्बन्धित कुछेक लेख लिखिये न। हिन्दी की समृद्धि हम सबके कन्धों पर ही है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

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