बढ़ गए कितने भाव ज़मीनों के
हौसले बुलंद हैं सब कमीनों के
भोली सूरत के पीछे नीच इरादे
धोकेबाज़ हैं, लगते हैं सीधे सादे
फरेब करने का आया है ऐसा दौर
सम्बन्ध है कहीं, रिश्ता कहीं और
साँसों की खुशबू में जो भी फंसेगा
झूठ के ज़हर में दम घुट के मरेगा
परवरिश में ऐसों की रहा होगा कोई खोट
दिखती नही जिनको कलेजे पे लगी चोट


3 comments:
कमीनेपन पर पूरी कमीनगी से चोट कि है जनाब....
कुंवर जी,
wah wah wah wah
nice
कुछ पंक्तियों का फॉण्ट बहुत छोटा हो गया है...
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