Thursday, May 27, 2010

दुनिया को कमीनी बनाने वालों पे लिखी कविता

बढ़ गए कितने भाव ज़मीनों के

हौसले बुलंद हैं सब कमीनों के

भोली सूरत के पीछे नीच इरादे

धोकेबाज़ हैं, लगते हैं सीधे सादे

फरेब करने का आया है ऐसा दौर

सम्बन्ध है कहीं, रिश्ता कहीं और

साँसों की खुशबू में जो भी फंसेगा

झूठ के ज़हर में दम घुट के मरेगा

परवरिश में ऐसों की रहा होगा कोई खोट

दिखती नही जिनको कलेजे पे लगी चोट

3 comments:

kunwarji's said...

कमीनेपन पर पूरी कमीनगी से चोट कि है जनाब....

कुंवर जी,

माधव said...

wah wah wah wah

nice

pawan dhiman said...

कुछ पंक्तियों का फॉण्ट बहुत छोटा हो गया है...