हमारे देश की हर व्यवस्था ढर्रेवादी है। कोई कितना भी एक्सपर्ट हो, उसका बीच में कूदना व्यवस्था को पचता नही है। जयराम रमेश मुश्किल में आये, शशि थरूर को तो जाना ही पडा। नौकरशाही हो या राजनीति, सब जगह 'लेटरल एंट्री' वालों को अस्वीकार ही किया जाता है।
बरसों से जमी पडी गंदगी को ढांचागत बदलाव के बिना हटाना संभव नही है, और ढांचा बदलने के लिए 'लेटरल एंट्री' चाहिए ही। कुछ निहित स्वार्थों के चलते देश अपने पड़ोसी चीन से सालों पीछे हो रहा है। आखिर कब तक लकीर के फ़कीर देश के विकास में रोड़ा बनते रहेंगे ?
Thursday, May 20, 2010
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