





शुक्रवार रात को वैष्णो देवी भवन में जो बदिन्तजामी देखी , वैसी किसी बड़े धार्मिक प्रतिष्ठान में नहीं देखी। तूफ़ान से घिरे श्रधालुओं के लिए न सर छुपाने को जगह, न पीने का पानी, ना ठहरने की व्यवस्था और ना कोई अनाउन्समेंट !
शौचालय इतने गंदे की बदबू के कारण जाने का मन न करे। न उनमे लाईट, ना पानी और नलके भी नदारद। कमोड चोक पड़े थे, टाइलें उखड़ी पडी थीं, और नलकों के अलावा सब जगह से पानी बरस रहा था।
कम्बल लेना/ जमा करना, लोकर/क्लोक रूम लेना और राह में सोये हुए दर्शनार्थियों को पार करके दर्शन करना टेढ़ी खीर थी।
क्या नहा के दर्शन करने की मनोदशा में कोई दर्शनार्थी होगा इस बदहाली में ? क्या होता है करोड़ों के चढ़ावे का? घोड़ों की गंदंगी , सर्वव्यापी मक्ख्कियां और टपकती बरसात एक ऐसा माहौल बनाते हैं की आप सकुशल पंहुचने की चिंता मैं " जय माता दी " बोलना भी भूल जाते हैं।


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