Saturday, November 26, 2011

बॉस से झगडा किया, सोचा नौकरी छोड़ दें , फिर ये कविता लिखी और सो गया..

हमसफ़र खोजा किये जब रास्ते तन्हा हुए
तेरे निशाँ ढूँढा किये जब रुसवा-ए-महफ़िल हुए
ख़ाक ही छाना किये जब ज़मीं से जुदा हुए
वक्त ही जाया किये जब तेरे बिन जिंदा रहे
ठोकरें खाते रहे जितना भी खुद बखुद चले
वक्त को नामंज़ूर था जिस जिद पे हम थे अड़े

Saturday, November 12, 2011

जमाना बदल गया..


ज़ज्बा बदल गया है तो रिश्ता बदल गया
बर्ताव बदल गया है तो तरीका बदल गया .
पसंद के बदलते ही नापसंद बदल गया
घर बदल गया तो रास्ता बदल गया .
कोई किसी वज़ह से कोई बेवज़ह बदल गया
कोई सिर्फ इसलिए बदला कि कोई और बदल गया .
कहीं दर्द बदल गया तो कहीं हमदर्द बदल गया
कोई बदल के भूला तो कोई भूल से बदल गया .
मौसम बदल गया तो मिजाज़ बदल गया
कोई कुछ बदल गया तो किसी का सब कुछ बदल गया.
फेहरिस्त लम्बी है कि क्या क्या बदल गया
बस यूँ समझ लीजिये कि ज़माना बदल गया.