आज कोई
यक्ष प्रश्न न किया जाये.
भुला दिया जाये
आज
विगत के आवरण को
अग्रिम अवसाद को
और
विलीन किया जाये
चेष्टाओं की प्रतिमा को
संभावनाओं के समुद्र में
क्योंकि
जब हर लकीर
छोटी है
एक बड़ी लकीर से
तो
लकीरों की शैय्या पर
क्यों सोया जाये.
क्यों न बिछाली जाये
सरलता की सफ़ेद चादर
और गुनगुनाया जाये
क्योंकि आज
विवेचनाएँ व्यर्थ हैं.
और शेष है
अनंत ज्ञान .


0 comments:
Post a Comment