Thursday, January 5, 2012

कुछ सालों पहले पूछे कुछ सवाल ....

अधिक होना गंतव्य और सीमाओं का
कम होना संसाधन और सुविधाओं का
क्या वंचित रह जाना ही नियति है ?
एक मात्र जीवन की अप्राप्त्य अनेकों खुशियाँ
अनेक कडवी स्मृतियों में दफ़न व्यक्तित्व
क्या चिर अवसाद ही जीवन गति है?
रिश्ते हुए कुछ पलों में एकत्र होता अवांछित अनुभव
दूर की मंजिल पर टिकी निगाहों से छिपता हुआ रास्ता
क्या कुछ जिंदगियां सिर्फ काटों पर चलने के लिए बनी हैं?

आज जीना है...

आज कोई
यक्ष प्रश्न न किया जाये.
भुला दिया जाये
आज
विगत के आवरण को
अग्रिम अवसाद को
और
विलीन किया जाये
चेष्टाओं की प्रतिमा को
संभावनाओं के समुद्र में
क्योंकि
जब हर लकीर
छोटी है
एक बड़ी लकीर से
तो
लकीरों की शैय्या पर
क्यों सोया जाये.
क्यों न बिछाली जाये
सरलता की सफ़ेद चादर
और गुनगुनाया जाये
क्योंकि आज
विवेचनाएँ व्यर्थ हैं.
और शेष है
अनंत ज्ञान .